जानिये किस से हार का सामना करना पड़ा परम वीर राम भक्त हनुमान को ….और मांगनी पड़ी माफ़ी …
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जानिये किस से हार का सामना करना पड़ा परम वीर राम भक्त हनुमान को ….और मांगनी पड़ी माफ़ी ….
यह कथा उस समय का है जब एक बार सिद्ध योगी मच्छिंद्रनाथ रामेश्वरम में आए थे, वहां वे भगवान राम द्वारा बनाया गया सेतु देख कर प्रसन्न हो जाते हैं और राम जी की भक्ति में लीन होकर समुद्र में स्नान करने लग जाते हैं। तभी वहां बैठे हनुमान जी की नजर मच्छिंद्रनाथ पर पड़ती है। हनुमान जी जानते थे, कि मच्छिंद्रनाथ एक सिद्ध योगी है।

फिर भी वह उनकी शक्ति की परीक्षा लेना चाहते थे.फिर हनुमान ने अपनी लीला आरंभ करते हैं और अचानक जोरदार बारिश शुरु होती है और खुद ही बारिश से बचने के लिए एक पहाड़ पर प्रहार करते हैं और वहां गुफा बनाने की कोशिश करने लगते हैं और यह सब मच्छिंद्रनाथ देखते हैं, और वे कहते हैं – हे वानर तुम मूर्खता कर रहे हो, जब प्यास लगती है तब कुआं नहीं खोदा जाता। तुम्हे अपने घर का प्रबंध पहले ही कर लेना चाहिए था।
यह सुनकर वानर मच्छिंद्रनाथ को पूछते हैं – आप कौन हैं। इस पर मच्छिंद्रनाथ कहते हैं मैं एक सिद्ध योगी हूं और मुझे मंत्र शक्ति प्राप्त है। इस पर हनुमान जी जानबूझकर कहते हैं भगवान और महाबली हनुमान जी से श्रेष्ठ और बलवान योद्धा इस संसार में कोई नहीं है। कुछ समय हनुमान जी की सेवा करने के कारण, उन्होंने प्रसन्न होकर अपनी शक्ति का 1%

हिस्सा मुझे भी दिया है। अगर आप में इतनी शक्ति है, अगर आप सिद्ध योगी है तो मुझे युद्ध में हरा कर दिखाओ नहीं तो खुद को सिद्ध योगी कहना बंद कर दो।
इस पर मच्छिंद्रनाथ कहते है तुम्हे अपनी शक्ति का घमंड नहीं होना चाहिए में तुम्हारा घमंड तोड़ने के लिए तुम्हारी चुनौती स्वीकार करता हूँ और युद्ध की शुरुआत हो जाती है। वानर रुपी हनुमान हवा में उड़ते हैं और अचानक मच्छिंद्रनाथ पर एक एक कर के 7 बड़े पर्वत उनके ऊपर फेंकते जाते हैं। पर्वतों को अपनी तरफ आते देख मच्छिंद्रनाथ ने अपनी मंत्र शक्ति का प्रयोग कर वह सातों पर्वतों को हवा में स्थिर कर दिया था और फिर बाद में उसे अपने मूल स्थान पर वापस भेज देते हैं।

यह देख महाबली हनुमान क्रोधित हो जाते हैं और वहां का सबसे बड़ा पर्वत उठाकर मच्छिंद्रनाथ पर फेंकने के लिए अपने हाथ में ले लेते हैं। यह देखते ही मच्छिंद्रनाथ ने समुंदर की पानी की कुछ बुँदे अपने हाथ में लेकर उस पर वाताकर्षण मंत्र की शक्ति से उस पानी की बूंदों को हनुमान के ऊपर फेंक दिया।
पानी की बूंदों का स्पर्श होते ही हनुमान का शरीर आसमान में स्थिर हो गया और उनका शरीर हलचल करने में असमर्थ हो गया। उस मंत्र के कारण कुछ क्षण के लिए हनुमान जी की सारी शक्ति छिन्न हो गई और इस वजह से उस पर्वत का भार उठा पाना भी भारी हो गया और वह तड़पने लग गए।

यह देखकर हनुमानजी के पिता वायुदेव जमीन पर आकर मच्छिंद्रनाथ से हनुमान जी को क्षमा करने की प्रार्थना करते हैं। वायुदेव की प्रार्थना पर मच्छिंद्रनाथ ने हनुमान को मुक्त कर दिया। तभी हनुमान अपने वास्तविक रुप में आ गए और उन्होंने मच्छिंद्रनाथ से से कहा – हे मच्छिंद्रनाथ आप स्वयं नारायण के अवतार हैं यह मैं जानता था, फिर भी आपकी शक्ति की परीक्षा लेने की चेष्टा कर बैठा। कृपया आप मुझे माफ कर दीजिए। यह सुनकर मच्छिंद्रनाथ हनुमान जी को माफ कर देते हैं, बस यहीं वो युद्ध था जिसमे हनुमान जी हार गए थे।
॥ जय श्री राम ॥
॥ जय हनुमान ॥
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