सन सत्तावन की क्रांति
सन सत्तावन की क्रांति
सन सत्तावन की थी चार जुलाई
जब गोरो ने पाँचली गांव पर तोप चलवाई
बादल घनघोर गगन में घुमड रहा था
नया बलिदान इतिहास में जुड रहा था
जंग ए आजादी का ज्वार जोरो पर था
क्रान्तिकारियो से बदला लेने का
खून सवार अन्यायी गोरो के सिर पर था
मेरठ के गाँवो में अंधाधुंध गोलियाँ चलवाई
सन सत्तावन की थी चार जुलाई
जब गोरो ने कोतवाल के
गांव वालो को फांसी लगाई
मौसम उन दिनो बरसाती था
हर ह्रदय क्रान्ति के जुनून में जज्बाती था
ब्रितानी हुकूमत का तख्ता पलट रहा था
क्रान्ति के लिये उठाया कोतवाल का बीडा
देशव्यापी गदर में बदल रहा था
अंग्रेजो की आँखो आगे उनका
जुल्मो सितम का सामान जल रहा था
शेर ए गदर कोतवाल धन सिहँ गुर्जर ने
क्रान्ति की ऐसी मशाल जलाई
फिर आई सन सत्तावन की चार जुलाई
जब गोरो ने मेरठ में सैकडो को फाँसी लगाई ।।

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