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कौन है वनबासी----? धर्म योद्धा या धर्म वीर ---!

कौन है वनबासी----? धर्म योद्धा या धर्म वीर ---!

क्या वनबासी ऋषियों की संतान हैं ? अथवा वीर योद्धाओं के वंशज या फिर इस्लामिक काल, ब्रिटिश काल में हिन्दू धर्म की रक्षार्थ संघर्ष करने वाले धर्म बचने हेतु जंगलों में रहने वाले आखिर ये हैं कौन--?
         जैसा की हम सभी को ज्ञात है की हिन्दू संस्कृति का विकाश क्रम नदियों और जंगलो के द्वारा हुआ है जहां प्रथम गुरुकुल सरस्वती नदी के किनारे खोला गया वहीं हमारे ऋषि महर्षियों ने वन व जंगलों मे भी गुरुकुल बनाकर शिक्षा दी गुरु माता बच्चों के देखभाल करती और गुरु उन्हे शिक्षा देते इसका मतलब हमारी संस्कृति वन्य संस्कृति है यही कारण आज भी वनबासियो मे वैदिक संस्कृति बची हुई है वेदों मे प्रकृति पूजा का वर्णन है जिसका पूर्ण रुपेण वनबासी पालन करते हैं वे मूर्ति पूजक न होकर प्रकृति पूजक हैं इससे यह सवित होता है कि वास्तविक वैदिक वनबासी ही है इसका मतलब ये हमारे वनबासी सब ऋषियों की ही संताने है याज्ञवल्क्य ने अपने ब्राह्मण ग्रब्थ मे इसक विषद बर्णन किया है। (शतपथ ब्राह्मण) 
         द्वापर और त्रेता के संधि काल मे भगवान श्रीराम हुए थे उन्होने ऋषि विश्वामित्र के नेतृत्व मे सारे वैदिक ज्ञान, शस्त्र युद्ध ज्ञान प्राप्त किया था, जब वे पिता की आज्ञा से वन मे गए तो उनकी भेट वनवासी जातियां जो सभी वैदिक ज्ञान युक्त थे, सभी शस्त्र और शास्त्र के जानकार थे तुलसीदास ने लिखा है की "विद्या वान गुणी अति चतुर, राम काज करबे को आतुर" यानि हनुमान जी चारों वेदों के ज्ञाता थे वे बंदर नहीं थे सुग्रीव किष्किंधा (दक्षिण) के राज़ा थे हनुमान जी उनके मंत्री थे, तो ये वनबासी तो हो सकते हैं पददलित कैसे हो सकते हैं--? हमे लगता है की ये वनबासी जातियाँ उच्च कुल की 'क्षत्रिय' संघर्ष शील जातीय है, क्योंकि उस समय शासन करने का अधिकार तो 'क्षत्रियों' का ही था इनका वर्तमान इससे मेल भी खाता है चाहे 'विरसा मुंडा' हो या 'सिद्धू कानू' अथवा 'तिलका मांझी' जिनके नेतृत्व मे धर्म और देश हित सारे देश मे स्वधर्म, स्वतन्त्रता हेतु संघर्ष किया वास्तविकता यह है की ब्रिटिश काल मे इन्ही संघर्ष के परिणाम स्वरूप इन्हे हिन्दू समाज से अलग-थलग कर पददलित करने का कुत्सित प्रयास किया गया । (त्रेता युगीन भारत)
         यह एक वास्तविक कथा है कोई 5 सौ वर्ष पूर्व स्वामी रामानन्द केवल 7वर्ष की आयु मे सन्यास यानि काशी गुरुकुल जाने लगे वर्तमान मे प्रयाग से काशी 125 किमी है वे गंगा जी के किनारे-किनारे जा रहे थे रात्री मे जब एक स्थान पर रुके संध्या करते समय सैकड़ो लोग वहाँ प्रवचन सुनने के लिए एकत्रित हो गए (बालक) स्वामी रामानन्द ने कहा की मुझे पता है की आप लोग यहाँ जंगल मे क्यों दुख का जीवन बिता रहे हो तुम लोगो ने बिधर्मियों से संघर्ष किया है धर्म बचाने हेतु आप लोग यहाँ पर जंगल मे छिपकर जीवन बिता रहे हो धन्य हैं आप लोग आप धर्म वीर ही नहीं धर्म योद्धा है आपके इस संघर्ष को यह सनातन धर्म हमेशा याद करेगा । (श्री विजय स्वामी, रामानन्द जी की जीवनी)  
        जब हम ठीक प्रकार से विचार करते हैं तो यह बात ध्यान मे आती है की यह सभी जनजातियाँ दलित पिछणों की संतान नहीं बल्कि ये सबके सब धर्म योद्धा हैं जिनहोने सनातन धर्म के लिए संघर्ष किया ये सभी वैदिक, क्षत्रिय व धर्मवीरों और ऋषियों की संतान हैं योजना वद्ध तरीके हिन्दू समाज को कमजोर करने के लिए उन्हे पददलित किया गया----!

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